“बाबूजी, अब बहुत हो गया,” रवि ने गंभीर स्वर में कहा। “मैंने सिडनी में सब इंतज़ाम कर लिया है। मेरा घर बहुत बड़ा है, वहां पार्क है, इंडियन कम्युनिटी है। आप यहाँ अकेले इस टूटे हुए घर में कैसे रह रहे हैं? मुझे रात-रात भर नींद नहीं आती आपकी चिंता में। इस बार मैं आपको लेने आया हूँ। आप मेरे साथ चल रहे हैं, और यह मेरा फैसला है।”
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लोहे के पुराने गेट की चरमराहट ने बरसों पुरानी उस खामोशी को तोड़ा जो ‘शांति कुंज’ के आंगन में पसरी हुई थी। कार का हॉर्न बजाने के बजाय, रवि ने खुद उतरकर गेट खोला। उसे पता था कि पिताजी को दोपहर की नींद प्यारी है और वह उनकी नींद में खलल नहीं डालना चाहता था।
रवि ने जब अपनी कार पोर्च में खड़ी की, तो उसकी नज़र सामने वाले बरामदे पर पड़ी। वहां आराम कुर्सी पर बैठे रामनाथ जी अखबार पढ़ते-पढ़ते ऊंघ रहे थे। उनके चश्मे का एक डंडी टेप से चिपका हुआ था और सफेद कुर्ते पर चाय का एक पुराना दाग था। रवि का दिल एक पल के लिए भर आया। पिछले चार सालों में, जबसे माँ गुज़री थीं और रवि अपनी नौकरी के चलते विदेश शिफ्ट हुआ था, पिताजी अकेले ही इस बड़े से घर को संभाल रहे थे।
“बाबूजी!” रवि ने धीरे से पुकारा।
रामनाथ जी हड़बड़ा कर जागे। अपनी धुंधली आँखों पर चश्मा ठीक किया और सामने खड़े शख्स को पहचानने की कोशिश की। जैसे ही उन्हें एहसास हुआ कि सामने उनका बेटा खड़ा है, उनके चेहरे पर झुर्रियों के बीच एक ऐसी मुस्कान खिली, जैसे पतझड़ में अचानक वसंत आ गया हो।
“अरे रवि! तू? तूने तो बताया भी नहीं कि तू आ रहा है?” रामनाथ जी उठने की कोशिश करने लगे, लेकिन घुटनों के दर्द ने उन्हें रोक लिया।
रवि ने दौड़कर उनके पैर छुए और उन्हें गले लगा लिया। “सरप्राइज़ देना चाहता था बाबूजी। और वैसे भी, बताता तो आप दुनिया भर की तैयारियां शुरू कर देते। मुझे मेहमान की तरह नहीं, बेटे की तरह आना था।”
शाम को घर के उसी पुराने आंगन में दोनों बाप-बेटे चाय पी रहे थे। घर की हालत देखकर रवि का मन उदास हो रहा था। दीवारों का पेंट उखड़ रहा था, बगीचे में जंगली घास उग आई थी, और जिस घर में कभी बच्चों की किलकारियां और माँ की डांट गूंजती थी, वहां अब सिर्फ सन्नाटा था।
रवि ने चाय का कप मेज पर रखा और उस मुद्दे पर बात करने की हिम्मत जुटाई जिसके लिए वह इतनी दूर आया था।
“बाबूजी, अब बहुत हो गया,” रवि ने गंभीर स्वर में कहा। “मैंने सिडनी में सब इंतज़ाम कर लिया है। मेरा घर बहुत बड़ा है, वहां पार्क है, इंडियन कम्युनिटी है। आप यहाँ अकेले इस टूटे हुए घर में कैसे रह रहे हैं? मुझे रात-रात भर नींद नहीं आती आपकी चिंता में। इस बार मैं आपको लेने आया हूँ। आप मेरे साथ चल रहे हैं, और यह मेरा फैसला है।”
रामनाथ जी ने अपनी चाय की चुस्की ली और दूर आसमान में उड़ते पक्षियों को देखते रहे। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
“बाबूजी, आप सुन रहे हैं न?” रवि ने थोड़ा ज़ोर देकर कहा। “माँ के जाने के बाद यहाँ क्या रखा है? सिर्फ यादें ही तो हैं, और यादें इंसान को कमज़ोर करती हैं। वहाँ आप पोते-पोतियों के साथ रहेंगे तो मन लगा रहेगा। यहाँ किसके सहारे जी रहे हैं?”
रामनाथ जी ने शांत भाव से बेटे की ओर देखा। “रवि, बेटा, तू सही कह रहा है। यादें कमज़ोर करती हैं, लेकिन जड़ें मज़बूत भी करती हैं। तू कल सुबह तक रुक, फिर हम इस बारे में बात करेंगे।”
रात को रवि को अपने पुराने कमरे में नींद नहीं आ रही थी। उसे लग रहा था कि पिताजी अपनी जिद्द नहीं छोड़ेंगे। उसे गुस्सा भी आ रहा था और तरस भी। उसे लगा कि पिताजी शायद मोह में फंसे हैं।
अगली सुबह, रवि की आँख बच्चों के शोर से खुली। उसने घड़ी देखी, सुबह के सात बज रहे थे। वह हैरान था कि इस सुनसान घर में बच्चों की आवाज़ें कहाँ से आ रही हैं?
वह बिस्तर से उठा और बाहर बरामदे में आया। जो नज़ारा उसने देखा, उसने उसके पैरों को वहीं जकड़ दिया।
बरामदे में एक बड़ी सी दरी बिछी थी, जिस पर करीब पंद्रह-बीस बच्चे बैठे थे। वे सब गरीब तबके के लग रहे थे। उनके हाथों में स्लेट और किताबें थीं। और उनके सामने, ब्लैकबोर्ड पर चॉक से लिखते हुए रामनाथ जी खड़े थे। उनका चेहरा चमक रहा था। कल वाली वो थकान और बुढ़ापा जैसे कहीं गायब हो गया था। वे बच्चों को गणित का एक सवाल समझा रहे थे और बच्चे पूरे उत्साह से जवाब दे रहे थे।
रवि चुपचाप एक खंभे के पीछे खड़ा होकर देखता रहा।
एक छोटी बच्ची खड़ी हुई और बोली, “दादू, कल आपने जो कहानी सुनाई थी, आज उसके आगे का सुनाएंगे न?”
रामनाथ जी हंसे, “अरे पहले ये सवाल तो हल करो, फिर कहानी भी सुनाऊंगा और हलवा भी खिलाऊंगा। आज मेरा बेटा आया है, वो शहर से तुम्हारे लिए चॉकलेट लाया होगा।”
रवि की आँखों में आंसू आ गए। उसे याद आया कि माँ के जाने के बाद पिताजी कितने टूट गए थे। उसे लगा था कि वे अकेलेपन में घुट रहे होंगे। लेकिन यहाँ तो उन्होंने अपना एक अलग ही संसार बसा लिया था।
क्लास खत्म होने के बाद, जब बच्चे चले गए, तो रवि धीरे से पिताजी के पास गया। रामनाथ जी डस्टर झाड़ रहे थे।
“तो… तूने देख लिया?” रामनाथ जी ने बिना मुड़े पूछा।
“ये सब कब से बाबूजी?” रवि ने पूछा।
“माँ के जाने के छह महीने बाद से,” रामनाथ जी कुर्सी पर बैठते हुए बोले। “शुरुआत में मुझे भी लगा था कि मैं मर जाऊंगा इस अकेलेपन से। घर की दीवारें मुझे खाने को दौड़ती थीं। फिर एक दिन, कामवाली का बेटा अपनी किताब लेकर आया और मुझसे कुछ पूछने लगा। मैंने उसे पढ़ाया। अगले दिन वो अपने दो दोस्तों को ले आया। धीरे-धीरे यह कारवां बढ़ता गया।”
रामनाथ जी ने रवि की आँखों में देखा। “बेटा, तू कह रहा था न कि मैं यहाँ किसके सहारे जी रहा हूँ? मैं इनके सहारे जी रहा हूँ। शहर में तेरे पास बड़ा फ्लैट है, नौकर-चाकर हैं, सुख-सुविधाएं हैं। लेकिन वहां मैं सिर्फ ‘रवि का पिता’ बनकर रह जाऊंगा। एक ऐसा बुड्ढा जो दिन भर बालकनी में बैठकर सड़क ताकता रहता है। लेकिन यहाँ… यहाँ मैं ‘मास्टरजी’ हूँ। यहाँ मेरी ज़रूरत है। ये बच्चे मेरा इंतज़ार करते हैं। अगर मैं चला गया, तो इनकी पढ़ाई का क्या होगा? इनके पास ट्यूशन के पैसे नहीं हैं रवि।”
रवि के पास कोई शब्द नहीं थे। वह अपनी ‘प्रैक्टिकल’ सोच और पिताजी की ‘इमोशनल’ हकीकत के बीच का अंतर साफ देख पा रहा था। वह जिसे ‘टूटा हुआ मकान’ समझ रहा था, वह असल में कई बच्चों के भविष्य की नींव थी। वह जिसे पिताजी का ‘अकेलापन’ समझ रहा था, वह दरअसल उनका ‘समर्पण’ था।
“लेकिन बाबूजी, आपकी तबीयत…” रवि ने कमजोर तर्क दिया।
“मेरी तबीयत तभी तक ठीक है जब तक मैं व्यस्त हूँ,” रामनाथ जी ने मुस्कुराते हुए कहा। “जिस दिन मैं तेरे सोफे पर जाकर बैठ गया, उस दिन सच में बीमार पड़ जाऊंगा। बेटा, इंसान को रोटी और छत के अलावा एक ‘मकसद’ की भी ज़रूरत होती है जीने के लिए। मेरे पास वो मकसद यहाँ है।”
रवि ने एक गहरी सांस ली। उसका वो अहंकार, कि वह अपने पिता को एक बेहतर ज़िंदगी दे सकता है, चकनाचूर हो गया था। उसे समझ आ गया कि बेहतर ज़िंदगी एसी कमरों में नहीं, बल्कि सुकून और सम्मान में होती है।
उस शाम, रवि ने अपना वापसी का टिकट कंफर्म किया, लेकिन अकेले।
“बाबूजी,” रवि ने नाश्ते की मेज पर कहा। “मैं आपको ले जाने की जिद्द नहीं करूँगा। मैं समझ गया हूँ कि मैं आपको जड़ से उखाड़कर गमले में नहीं लगा सकता। बरगद के पेड़ जंगल में ही अच्छे लगते हैं।”
रामनाथ जी की आँखों में नमी आ गई। उन्होंने बेटे का हाथ थाम लिया।
“लेकिन एक शर्त है,” रवि ने कहा। “मैं इस घर की मरम्मत करवाऊंगा। और वो जो बरामदा है न, उसे हम पक्का करवाएंगे और वहां एक छोटी लाइब्रेरी बनाएंगे। मैंने कुछ लैपटॉप और किताबें ऑर्डर कर दी हैं। अब से आपकी क्लास ‘स्मार्ट क्लास’ होगी।”
रामनाथ जी हंस पड़े, “चल मंजूर है। पर खर्चा ज्यादा मत करना।”
“खर्चा नहीं बाबूजी, ये इनवेस्टमेंट है,” रवि ने कहा।
रवि जब वापस जाने के लिए कार में बैठा, तो उसने पीछे मुड़कर देखा। रामनाथ जी गेट पर खड़े थे, लेकिन अब वो अकेले नहीं दिख रहे थे। उसे उनके आसपास वो अदृश्य ऊर्जा महसूस हो रही थी जो उन बच्चों की हंसी और उम्मीदों से बनी थी।
रवि खाली हाथ लौट रहा था, लेकिन उसका दिल भरा हुआ था। उसे तसल्ली थी कि उसके पिता अकेले नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसी दुनिया के राजा हैं जिसे दौलत से नहीं खरीदा जा सकता। उसने सीख लिया था कि माता-पिता को सिर्फ देखभाल की ज़रूरत नहीं होती, उन्हें अपने वजूद और अपनी उपयोगिता के एहसास की भी ज़रूरत होती है। और कभी-कभी, प्यार का मतलब पास रखना नहीं, बल्कि उनकी खुशी के लिए उन्हें उनके हाल पर, उनकी दुनिया में छोड़ देना होता है।
कार धूल उड़ाती हुई आगे बढ़ गई, और पीछे ‘शांति कुंज’ अपनी नई उम्मीदों के साथ मुस्कुराता रह गया।
लेखिका : रमा शुक्ला


